Saturday, September 22, 2012

ये महलों, ये तख्तों, ये ताजों की दुनिया : साहिर लुधियानवी

साहिर लुधियानवी
ये महलों, ये तख्तों, ये ताजों की दुनिया,
ये इन्सां के दुश्मन, समाजों की दुनिया,
ये दौलत के भूखे, रिवाजों की दुनिया,
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है,
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है

हर इक जिस्म घायल, हर इक रूह प्यासी,
निगाहों में उलझन, दिलों में उदासी,
ये दुनिया है या आलम-ऐ-हवासी
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है

जहां इक खिलौना है इन्सां की हस्ती,
ये बस्ती है मुर्दा-परस्तों कि बस्ती,
यहाँ पर तो जीवन से है मौत सस्ती,
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है

जवानी भटकती है बेज़ार बनकर,
जवान जिस्म सजते हैं बाज़ार बनकर,
जहां प्यार होता है व्यापार बनकर,
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है

ये दुनिया जहां आदमी कुछ नहीं है,
वफ़ा कुछ नहीं, दोस्ती कुछ नहीं है,
जहां प्यार की कद्र ही कुछ नहीं है,
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है

जला दो इसे, फूंक डालो ये दुनिया,
जला दो जला दो,
जला दो इसे, फूंक डालो ये दुनिया,
मेरे सामने से हटा लो ये दुनिया,
तुम्हारी है तुम ही संभालो ये दुनिया,
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है

Wednesday, July 11, 2012

खँडहर बचे हुए हैं, इमारत नहीं रही : दुष्यंत कुमार

दुष्यंत कुमार
खँडहर बचे हुए हैं, इमारत नहीं रही
अच्छा हुआ कि सर पे कोई छत नहीं रही

कैसी मशालें ले के चले तीरगी में आप
जो रोशनी थी वो भी सलामत नहीं रही

हमने तमाम उम्र अकेले सफ़र किया
हम पर किसी ख़ुदा की इनायत नहीं रही

मेरे चमन में कोई नशेमन नहीं रहा
या यूँ कहो कि बर्क़ की दहशत नहीं रही

हमको पता नहीं था हमें अब पता चला
इस मुल्क में हमारी हक़ूमत नहीं रही

कुछ दोस्तों से वैसे मरासिम नहीं रहे
कुछ दुश्मनों से वैसी अदावत नहीं रही

हिम्मत से सच कहो तो बुरा मानते हैं लोग
रो—रो के बात कहने की आदत नहीं रही

सीने में ज़िन्दगी के अलामात हैं अभी
गो ज़िन्दगी की कोई ज़रूरत नहीं रही

परिन्दे अब भी पर तोले हुए हैं : दुष्यंत कुमार

दुष्यंत कुमार
परिन्दे अब भी पर तोले हुए हैं
हवा में सनसनी घोले हुए हैं

तुम्हीं कमज़ोर पड़ते जा रहे हो
तुम्हारे ख़्वाब तो शोले हुए हैं

ग़ज़ब है सच को सच कहते नहीं वो
क़ुरान—ओ—उपनिषद् खोले हुए हैं

मज़ारों से दुआएँ माँगते हो
अक़ीदे किस क़दर पोले हुए हैं

हमारे हाथ तो काटे गए थे
हमारे पाँव भी छोले हुए हैं

कभी किश्ती, कभी बतख़, कभी जल
सियासत के कई चोले हुए हैं

हमारा क़द सिमट कर मिट गया है
हमारे पैरहन झोले हुए हैं

चढ़ाता फिर रहा हूँ जो चढ़ावे
तुम्हारे नाम पर बोले हुए हैं

आज सड़कों पर : दुष्यंत कुमार

दुष्यंत कुमार
आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख,
पर अंधेरा देख तू आकाश के तारे न देख।


एक दरिया है यहां पर दूर तक फैला हुआ,
आज अपने बाज़ुओं को देख पतवारें न देख।


अब यकीनन ठोस है धरती हकीकत की तरह,
यह हक़ीक़त देख लेकिन खौफ़ के मारे न देख।


वे सहारे भी नहीं अब जंग लड़नी है तुझे,
कट चुके जो हाथ उन हाथों में तलवारें न देख।


ये धुंधलका है नज़र का तू महज़ मायूस है,
रोजनों को देख दीवारों में दीवारें न देख।


राख कितनी राख है, चारों तरफ बिखरी हुई,
राख में चिनगारियां ही देख अंगारे न देख।

मेरे स्वप्न तुम्हारे पास सहारा पाने आयेंगे : दुष्यंत कुमार

दुष्यंत कुमार
मेरे स्वप्न तुम्हारे पास सहारा पाने आयेंगे
इस बूढे पीपल की छाया में सुस्ताने आयेंगे

हौले-हौले पाँव हिलाओ जल सोया है छेडो मत
हम सब अपने-अपने दीपक यहीं सिराने आयेंगे

थोडी आँच बची रहने दो थोडा धुँआ निकलने दो
तुम देखोगी इसी बहाने कई मुसाफिर आयेंगे

उनको क्या मालूम निरूपित इस सिकता पर क्या बीती
वे आये तो यहाँ शंख सीपियाँ उठाने आयेंगे

फिर अतीत के चक्रवात में दृष्टि न उलझा लेना तुम
अनगिन झोंके उन घटनाओं को दोहराने आयेंगे

रह-रह आँखों में चुभती है पथ की निर्जन दोपहरी
आगे और बढे तो शायद दृश्य सुहाने आयेंगे
मेले में भटके होते तो कोई घर पहुँचा जाता
हम घर में भटके हैं कैसे ठौर-ठिकाने आयेंगे

हम क्यों बोलें इस आँधी में कई घरौंदे टूट गये
इन असफल निर्मितियों के शव कल पहचाने जायेंगे

हम इतिहास नहीं रच पाये इस पीडा में दहते हैं
अब जो धारायें पकडेंगे इसी मुहाने आयेंगे

Wednesday, July 4, 2012

खूनी हस्ताक्षर : श्री गोपाल प्रसाद व्यास

श्री गोपाल प्रसाद व्यास
वह खून कहो किस मतलब का जिसमे उबाल का नाम नहीं,
वह खून कहो किस मतलब का आ सके देश के काम नहीं.

वह खून कहो किस मतलब का जिसमे जीवन ना रवानी हैं,
जो परवश होकर बहता हैं वह खून नहीं हैं पानी हैं.

उस दिन दुनिया ने सही सही खून की कीमत पहचानी थी,
जिस दिन सुभाष ने बर्मा में मांगी उनसे कुर्बानी थी.

बोले स्वतंत्रता की खातिर बलिदान तुम्हे करना होगा,
तुम बहुत जी चुके हो जग में लेकिन आगे मरना होगा.

आज़ादी के चरणों में जो जयमाल चढ़ाई जायेगी,
वह सुनो तुम्हारे शीशों के फूलों से गूँथी जायेगी.

आज़ादी का संग्राम कही पैसे पर खेला जाता हैं ,
यह शीश काटने का सौदा नंगे सर झेला जाता हैं.

आज़ादी का इतिहास कही काली स्याही लिख पाती हैं ?
इसको लिखने के लिए खून की नदी बहाई जाती हैं.

यह कहते कहते वक्ता की आँखों में लहू उतर आया,
मुख रक्त वर्ण हो दमक उठा दमकी उनकी रक्तिम काया.

आजानुबाहू ऊँची करके वो बोले ” रक्त मुझे देना “
इसके बदले में भारत की आज़ादी तुम मुझसे लेना.

हो गयी सभा में उथल-पुथल सीने में दिल ना समाते थे,
स्वर इन्कलाब के नारों के कोसों तक छाये जाते थे.

हम देंगे-देंगे खून शब्द बस यही सुनाई देते थे,
रण में जाने को युवक खड़े तैयार दिखाई देते थे.

बोले सुभाष ऐसे नहीं बातों से मतलब सरता हैं,
लो यह कागज़ हैं कौन यहाँ आकर हस्ताक्षर करता हैं.

इसको भरने वाले जन को सर्वस्व समर्पण करना हैं,
अपना तन-मन -धन जीवन माता को अर्पण करना हैं.

पर यह साधारण पत्र नहीं आज़ादी का परवाना हैं,
इसपर तुमको अपने तन का कुछ उज्ज्वल रक्त गिराना हैं.

वह आगे आये जिसके तन में भारतीय खून बहता हो,
वह आगे आये जो अपने को हिंदुस्तानी कहता हो.

वह आगे आये जो इसपर खूनी हस्ताक्षर देता हो ,
मैं कफ़न बढ़ाता हूँ आये, जो हसकर इसको लेता हो.

सारी जनता हुंकार उठी हम आते हैं हम आते हैं,
माता के चरणों में यह लो हम अपना रक्त चढाते हैं.

साहस से बढे युवक उस दिन,देखा बढ़ते ही आते थे,
चाक़ू-छुरी कटियारों से वो अपना रक्त गिराते थे.

फिर उसी रक्त स्याही में वो अपनी कलम डुबाते थे,
आज़ादी के परवाने पर वो हस्ताक्षर करते जाते थे.

उस दिन तारों ने देखा हिंदुस्तानी इतिहास नया,
जब लिखा महा रणवीरों ने खून से अपना इतिहास नया.

Thursday, June 7, 2012

हो गई है पीर पर्वत : दुष्यंत कुमार

दुष्यंत कुमार
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी
शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए

Thursday, March 29, 2012

अपने ही मन से कुछ बोलें : अटल बिहारी वाजपेयी

अटल बिहारी वाजपेयी
क्या खोया, क्या पाया जग में
मिलते और बिछुड़ते मग में
मुझे किसी से नहीं शिकायत
यद्यपि छला गया पग-पग में
एक दृष्टि बीती पर डालें, यादों की पोटली टटोलें!

पृथ्वी लाखों वर्ष पुरानी
जीवन एक अनन्त कहानी
पर तन की अपनी सीमाएँ
यद्यपि सौ शरदों की वाणी
इतना काफ़ी है अंतिम दस्तक पर, खुद दरवाज़ा खोलें!

जन्म-मरण अविरत फेरा
जीवन बंजारों का डेरा
आज यहाँ, कल कहाँ कूच है
कौन जानता किधर सवेरा
अंधियारा आकाश असीमित,प्राणों के पंखों को तौलें!
अपने ही मन से कुछ बोलें!

आओ फिर से दिया जलाएँ : अटल बिहारी वाजपेयी

अटल बिहारी वाजपेयी
आओ फिर से दिया जलाएँ
भरी दुपहरी में अंधियारा
सूरज परछाई से हारा
अंतरतम का नेह निचोड़ें-
बुझी हुई बाती सुलगाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ

हम पड़ाव को समझे मंज़िल
लक्ष्य हुआ आंखों से ओझल
वतर्मान के मोहजाल में-
आने वाला कल न भुलाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ।

आहुति बाकी यज्ञ अधूरा
अपनों के विघ्नों ने घेरा
अंतिम जय का वज़्र बनाने-
नव दधीचि हड्डियां गलाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ

क़दम मिलाकर चलना होगा : अटल बिहारी वाजपेयी

अटल बिहारी वाजपेयी
बाधाएँ आती हैं आएँ
घिरें प्रलय की घोर घटाएँ,
पावों के नीचे अंगारे,
सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ,
निज हाथों में हँसते-हँसते,
आग लगाकर जलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।


हास्य-रूदन में, तूफ़ानों में,
अगर असंख्यक बलिदानों में,
उद्यानों में, वीरानों में,
अपमानों में, सम्मानों में,
उन्नत मस्तक, उभरा सीना,
पीड़ाओं में पलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।


उजियारे में, अंधकार में,
कल कहार में, बीच धार में,
घोर घृणा में, पूत प्यार में,
क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में,
जीवन के शत-शत आकर्षक,
अरमानों को ढलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।


सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ,
प्रगति चिरंतन कैसा इति अब,
सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ,
असफल, सफल समान मनोरथ,
सब कुछ देकर कुछ न मांगते,
पावस बनकर ढ़लना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।


कुछ काँटों से सज्जित जीवन,
प्रखर प्यार से वंचित यौवन,
नीरवता से मुखरित मधुबन,
परहित अर्पित अपना तन-मन,
जीवन को शत-शत आहुति में,
जलना होगा, गलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

कौरव कौन, कौन पांडव : अटल बिहारी वाजपेयी

अटल बिहारी वाजपेयी
कौरव कौन
कौन पांडव,
टेढ़ा सवाल है|
दोनों ओर शकुनि
का फैला
कूटजाल है|
धर्मराज ने छोड़ी नहीं
जुए की लत है|
हर पंचायत में
पांचाली
अपमानित है|
बिना कृष्ण के
आज
महाभारत होना है,
कोई राजा बने,
रंक को तो रोना है|

मौत से ठन गई : अटल बिहारी वाजपेयी

अटल बिहारी वाजपेयी
ठन गई!
मौत से ठन गई!

जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,

रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,
यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई।

मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,
ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं।

मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ,
लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ?

तू दबे पाँव, चोरी-छिपे से न आ,
सामने वार कर फिर मुझे आज़मा।

मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र,
शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर।

बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,
दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं।

प्यार इतना परायों से मुझको मिला,
न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला।

हरी हरी दूब पर : अटल बिहारी वाजपेयी

अटल बिहारी वाजपेयी
हरी हरी दूब पर
ओस की बूंदे
अभी थी,
अभी नहीं हैं|
ऐसी खुशियाँ
जो हमेशा हमारा साथ दें
कभी नहीं थी,
कहीं नहीं हैं|

क्काँयर की कोख से
फूटा बाल सूर्य,
जब पूरब की गोद में
पाँव फैलाने लगा,
तो मेरी बगीची का
पत्ता-पत्ता जगमगाने लगा,
मैं उगते सूर्य को नमस्कार करूँ
या उसके ताप से भाप बनी,
ओस की बुँदों को ढूंढूँ?

सूर्य एक सत्य है
जिसे झुठलाया नहीं जा सकता
मगर ओस भी तो एक सच्चाई है
यह बात अलग है कि ओस क्षणिक है
क्यों न मैं क्षण क्षण को जिऊँ?
कण-कण मेँ बिखरे सौन्दर्य को पिऊँ?

सूर्य तो फिर भी उगेगा,
धूप तो फिर भी खिलेगी,
लेकिन मेरी बगीची की
हरी-हरी दूब पर,
ओस की बूंद
हर मौसम में नहीं मिलेगी|

Friday, February 17, 2012

ओ नादाँ परिंदे घर आजा - इरशाद कामिल

इरशाद कामिल
[ हिंदी फिल्म "रॉक्स्टार" (रिलीज तारीख 11-11-2011) से ]
 ओ नादाँ परिंदे घर आजा
ओ नादाँ परिंदे घर आजा
ओ नादाँ परिंदे घर आजा
घर आजा घर आजा घर आजा आ...

क्यूँ  देश-विदेश फिरे मारा
क्यूँ हाल-विहाल थका हारा
तू रात-बिरात का बंजारा
ओ नादाँ परिंदे घर आजा
घर आजा घर आजा घर आजा आ...
नादाँ परिंदे घर आजा
नादाँ परिंदे घर आजा
नादाँ परिंदे घर आजा
नादाँ परिंदे घर आजा

सौ दर्द बदन पे फैले हैं, हर करम के कपड़े मैले हैं...

काटे चाहे जितना, परों से हवाओं को
खुद से न बच पायेगा तू
तोड़ आसमानों को, फूक दे जहानों को
खुद को छुपा न पायेगा तू
कोई भी ले रस्ता, तू है तू ले हस्ता
अपने ही घर आएगा तू

ओ नादाँ...
ओ नादाँ परिंदे घर आजा
घर आजा घर आजा घर आजा आ...
नादाँ परिंदे घर आजा
नादाँ परिंदे घर आजा
नादाँ परिंदे घर आजा
नादाँ परिंदे घर आजा

डागर कागर मोरी इतनी अरज तोसे चुन चुन खाइयो मांस
डागर कागर मोरी इतनी अरज तोसे चुन चुन खाइयो मांस
रे जिया रे खाइयो ना तू नैना मोरे
पिया के मिलन की आस
खाइयो ना तू नैना मोरे खाइयो ना तू नैना मोहे
पिया के मिलन की आस

ओ नादाँ...
ओ नादाँ परिंदे घर आजा
घर आजा घर आजा घर आजा आ...
नादाँ परिंदे घर आजा
नादाँ परिंदे घर आजा
नादाँ परिंदे घर आजा
नादाँ परिंदे घर आजा
नादाँ परिंदे घर आजा
नादाँ परिंदे घर आजा
नादाँ परिंदे घर आजा
नादाँ परिंदे घर आजा...

जो भी मैं - इरशाद कामिल

इरशाद कामिल
[ हिंदी फिल्म "रॉक्स्टार" (रिलीज तारीख 11-11-2011) से ]
या या या... ओ...
जो भी मैं, कहना चाहूँ
बर्बाद करे, अलफ़ाज़ मेरे, अलफ़ाज़ मेरे
ओ या या ओ...

कभी मुझे लगे के जैसे, सारा ही ये जहाँ है जागे
जो है भी और नहीं भी है, ये फिजा हवा घटा बहारें
तुझे करे इशारे ये
कैसे कहूँ, कहानी मैं इनकी

जो भी मैं, कहना चाहूँ
बर्बाद करे, अलफ़ाज़ मेरे, अलफ़ाज़ मेरे
ओ या या ओ...

मैंने  यहीं सोचा है अक्सर, तू भी मैं भी सभी है शीशे
खुद ही को हम सभी मैं देखें, नहीं हूँ मैं हूँ मैं तो फिर भी
सही गलत, तुम्हारा मैं
मुझे पाना, पाना है खुद को

जो भी मैं, कहना चाहूँ
बर्बाद करे, अलफ़ाज़ मेरे, अलफ़ाज़ मेरे
ओ या या ओ...

Thursday, February 16, 2012

साड्डा हक, ऐथे रख - इरशाद कामिल

इरशाद कामिल
[ हिंदी फिल्म "रॉक्स्टार" (रिलीज तारीख 11-11-2011) से ]
तुम लोगों की, इस दुनिया में
हर कदम पे, इंसान ग़लत
मैं  सही समझ के जो भी कहूँ
तुम कहते हो ग़लत, मैं गलत हूँ फिर कौन सही कौन सही
मर्ज़ी से जीने की भी मैं
क्या तुम सबको मैं अर्जी दूं
मतलब कि तुम सबका मुझपे
मुझसे भी ज्यादा हक है

साड्डा हक, ऐथे रख... (8)
ना ना ना...
साड्डा हक, ऐथे रख... (4)

हे! इन गद्दारों में या उधारों में
तुम  मेरे जीने की आदत का क्यूँ घोंट रहे हो दम
बेसलीका मैं, उस गली का मैं
ना जिस में हया, ना जिस में शरम
मन बोले के रस में जीने का हरजाना दुनिया दुश्मन
सब बेगाना इन्हें आग लगाना
मन बोले मन बोले, मन से जीना या मर जाना

साड्डा हक, ऐथे रख... (8)
ना ना ना...

ओ  इको-फ्रेंडली, नेचर के रक्षक, मैं भी हूँ नेचर
रिवाजों से, समाजों से क्यूँ
तू काटे मुझे, क्यूँ बांटे मुझे इस तरह
क्यूँ सच का सबक सिखाए, जब सच सुन भी न पाए
सच कोई बोले तो तू, नियम क़ानून बताए
तेरा डर, तेरा प्यार, तेरी वाह, तू ही रख रख साला

साड्डा हक, ऐथे रख... (4)
ऐथे ऐथे रख
साड्डा हक, ऐथे रख... (8)

तुम हो - इरशाद कामिल

इरशाद कामिल
[ हिंदी फिल्म "रॉक्स्टार" (रिलीज तारीख 11-11-2011) से ]
तुम हो...

तुम हो आस मेरे, साथ मेरे
हो तुम हो
जितना महसूस करूँ तुमको उतना ही पा भी लूं.


तुम हो मेरे लिए मेरे लिए हो तुम यूं
खुद को मैं हार गया तुमको
तुमको मैं जीता हूँ

कहीं से कहीं को भी

आओगे मज़ा चले

पूछे बिना किसीसे हम मिले
बंदिशें ना रही

तुम हो...

तुम हो आस मेरे, साथ मेरे
हो तुम हो
जितना महसूस करूँ तुमको उतना ही पा भी लूं.


किस तरह छीनेगा
मुझसे ये जहाँ तुम्हें
तुम भी हो फिर क्या फिकर अब हमें
तुम हो मेरे लिए मेरे लिए हो तुम यूं
खुद को मैं हार गया तुमको
तुमको मैं जीता हूँ

तुम हो...

Monday, February 13, 2012

कुछ शे'र - जावेद अख़्तर

जावेद अख़्तर
गिन गिन के सिक्के हाथ मेरा खुरदरा हुआ
जाती रही वो लम्स[1] की नर्मी, बुरा हुआ
~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*
ऊँची इमारतों से मकां मेरा घिर गया
कुछ लोग मेरे हिस्से का सूरज भी खा गए
~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*
कौन-सा शे'र सुनाऊँ मैं तुम्हें, सोचता हूँ
नया मुब्हम[2] है बहुत और पुराना मुश्किल
~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*
ख़ुशशकल[3] भी है वो, ये अलग बात है, मगर
हमको ज़हीन[4] लोग हमेशा अज़ीज़[5] थे
~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*
हमको उठना तो मुँह अँधेरे था
लेकिन इक ख़्वाब हमको घेरे था
~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*
सब का ख़ुशी से फ़ासला एक क़दम है
हर घर में बस एक ही कमरा कम है
~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*
अपनी वजहे-बरबादी सुनिये तो मज़े की है
ज़िंदगी से यूँ खेले जैसे दूसरे की है
~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*
इस शहर में जीने के अंदाज़ निराले हैं
होठों पे लतीफ़े हैं आवाज़ में छाले हैं
~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*
गली में शोर था मातम था और होता क्या
मैं घर में था मगर इस गुल[6] में कोई सोता क्या
~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*
आज की दुनिया में जीने का क़रीना[7] समझो
जो मिलें प्यार से उन लोगों को ज़ीना[8] समझो
~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*
कम से कम उसको देख लेते थे
अब के सैलाब में वो पुल भी गया
~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*
ऐ सफ़र इतना रायगाँ[9] तो न जा
न हो मंज़िल कहीं तो पहुँचा दे
~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*
लो देख लो यह इश्क़ है ये वस्ल[10] है ये हिज़्र[11]
अब लौट चलें आओ बहुत काम पड़ा है
~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*
वह शक्ल पिघली तो हर शय में ढल गयी जैसे
अजीब बात हुई है उसे भुलाने में
~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*
वो नहर एक क़िस्सा है दुनिया के वास्ते
फ़रहाद ने तराशा था ख़ुद को चटान पर
~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*
मिरे वुजूद से यूँ बेख़बर है वो जैसे
वो एक धूपघड़ी है मैं रात का पल हूँ
~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*
उन चराग़ों में तेल ही कम था
क्यों गिला फिर हमें हवा से रहे
~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*
मेरी बुनियादों में कोई टेढ़ थी
अपनी दीवारों को क्या इल्ज़ाम दूँ
~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*
तुम्हें भी याद नहीं और मैं भी भूल गया
वो लम्हा कितना हसीं था मगर फ़ुज़ूल गया
~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*
आगही[12] से मिली है तनहाई
आ मिरी जान मुझको धोखा दे
~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*
रात सर पर है और सफ़र बाकी
हमको चलना ज़रा सवेरे था
~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*
सब हवाएँ ले गया मेरे समंदर की कोई
और मुझको एक कश्ती बादबानी[13] दे गया
~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*
पहले भी कुछ लोगों ने जौ बो कर गेहूँ चाहा था
हम भी इस उम्मीद में हैं लेकिन कब ऐसा होता है
~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*
मेरे कुछ पल मुझको दे दो बाकी सारे दिन लोगो
तुम जैसा जैसा कहते हो सब वैसा वैसा होगा
~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*

अब अगर आओ तो जाने के लिए मत आना - ज़ावेद अख्तर

ज़ावेद अख्तर
अब अगर आओ तो जाने के लिए मत आना
सिर्फ एहसान जताने के लिए मत आना

मैंने पलकों पे तमन्‍नाएँ सजा रखी हैं
दिल में उम्‍मीद की सौ शम्‍मे जला रखी हैं
ये हसीं शम्‍मे बुझाने के लिए मत आना

प्‍यार की आग में जंजीरें पिघल सकती हैं
चाहने वालों की तक़दीरें बदल सकती हैं
तुम हो बेबस ये बताने के लिए मत आना

अब तुम आना जो तुम्‍हें मुझसे मुहब्‍बत है कोई
मुझसे मिलने की अगर तुमको भी चाहत है कोई
तुम कोई रस्‍म निभाने के लिए मत आना

कभी यूँ भी तो हो - ज़ावेद अख्तर

ज़ावेद अख्तर
कभी यूँ भी तो हो
दरिया का साहिल हो
पूरे चाँद की रात हो
और तुम आओ


कभी यूँ भी तो हो
परियों की महफ़िल हो
कोई तुम्हारी बात हो
और तुम आओ


कभी यूँ भी तो हो
ये नर्म मुलायम ठंडी हवायें
जब घर से तुम्हारे गुज़रें
तुम्हारी ख़ुश्बू चुरायें
मेरे घर ले आयें


कभी यूँ भी तो हो
सूनी हर मंज़िल हो
कोई न मेरे साथ हो
और तुम आओ


कभी यूँ भी तो हो
ये बादल ऐसा टूट के बरसे
मेरे दिल की तरह मिलने को
तुम्हारा दिल भी तरसे
तुम निकलो घर से


कभी यूँ भी तो हो
तनहाई हो, दिल हो
बूँदें हो, बरसात हो
और तुम आओ


कभी यूँ भी तो हो

हर ख़ुशी में कोई कमी-सी है - ज़ावेद अख्तर

ज़ावेद अख्तर
हर ख़ुशी में कोई कमी-सी है
हँसती आँखों में भी नमी-सी है

दिन भी चुप चाप सर झुकाये था
रात की नब्ज़ भी थमी-सी है

किसको समझायें किसकी बात नहीं
ज़हन और दिल में फिर ठनी-सी है

ख़्वाब था या ग़ुबार था कोई
गर्द इन पलकों पे जमी-सी है

कह गए हम ये किससे दिल की बात
शहर में एक सनसनी-सी है

हसरतें राख हो गईं लेकिन
आग अब भी कहीं दबी-सी है

यही हालात इब्तदा से रहे - ज़ावेद अख्तर

ज़ावेद अख्तर
यही हालात इब्तदा[1] से रहे
लोग हमसे ख़फ़ा-ख़फ़ा-से रहे

बेवफ़ा तुम कभी न थे लेकिन
ये भी सच है कि बेवफ़ा-से रहे

इन चिराग़ों में तेल ही कम था
क्यों गिला फिर हमें हवा से रहे

बहस, शतरंज, शेर, मौसीक़ी[2]
तुम नहीं रहे तो ये दिलासे रहे

उसके बंदों को देखकर कहिये
हमको उम्मीद क्या ख़ुदा से रहे

ज़िन्दगी की शराब माँगते हो
हमको देखो कि पी के प्यासे रहे

मैं तो झोंका हूँ हवा का उड़ा ले जाऊँगा - डॉ. कुमार विश्वास

डॉ. कुमार विश्वास
मैं तो झोंका हूँ हवा का उड़ा ले जाऊँगा
जागती रहना तुझे तुझसे चुरा ले जाऊँगा

हो के कदमों पे निछावर फूल ने बुत से कहा
ख़ाक में मिल के भी मैं खुश्बू बचा ले जाऊँगा

कौन सी शै मुझको पहुँचाएगी तेरे शहर तक
ये पता तो तब चलेगा जब पता ले जाऊँगा

कोशिशें मुझको मिटाने की भले हों कामयाब
मिटते-मिटते भी मैं मिटने का मजा ले जाऊँगा

शोहरतें जिनकी वजह से दोस्त दुश्मन हो गये
सब यह रह जायेंगी मैं साथ क्या ले जाऊँगा

Monday, January 16, 2012

कोई दीवाना कहता है : डॉ. कुमार विश्वास

डॉ. कुमार विश्वास
कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है
मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है
मैं तुझसे दूर कैसा हूँ तू मुझसे दूर कैसी है
ये तेरा दिल समझता है या मेरा दिल समझता है

मुहब्बत एक अहसासों की पावन सी कहानी है
कभी कबीरा दीवाना था कभी मीरा दीवानी है
यहाँ सब लोग कहते हैं मेरी आँखों में आंसू है
जो तू समझे तो मोती है जो ना समझे तो पानी है

बदलने को तो इन आँखों के मंज़र कम नहीं बदले
तुम्हारी याद के मौसम हमारे ग़म नहीं बदले
तुम अगले जन्म में हमसे मिलोगी तब तो मानोगी
ज़माने और सदी की इस बदल में हम नहीं बदले

हमें मालूम है दो दिल जुदाई सह नहीं सकते
मगर रस्मे-वफ़ा ये है, कि ये भी कह नहीं सकते
ज़रा कुछ देर तुम उन साहिलों कि चीख सुन भर लो
जो लहरों में तो डूबे हैं, मगर संग बह नहीं सकते

समंदर पीर का अंदर है लेकिन रो नहीं सकता
ये आंसू प्यार का मोती है इसको खो नहीं सकता
मेरी चाहत को दुल्हन तू बना लेना मगर सुन ले
जो मेरा हो नहीं पाया वो तेरा हो नहीं सकता

कि भ्रमर कोई कुमुदनी पर मचल बैठा तो हंगामा
हमारे दिल में कोई ख्वाब पल बैठा तो हंगामा
अभी तक डूब कर सुनते थे सब किस्सा मुहब्बत का
मैं किस्से को हकीकत में बदल बैठा तो हंगामा

मिले हर जख्म को मुस्कान से सीना नहीं आया
अमरता चाहते थे, पर गरल पीना नहीं आया
तुम्हारी और मेरी दास्ताँ में फ़र्क इतना है
मुझे मरना नहीं आया, तुम्हे जीना नहीं आया

पनाहों में जो आया हो तो उस पे वार क्या करना
जो दिल हार हुआ हो उस पे फिर अधिकार क्या करना
मुहब्बत का मज़ा तो डूबने कि कश्मकश में है
हो ग़र मालूम गहराई तो दरिया पार क्या करना

जहाँ हर दिन सिसकना है जहाँ हर रात गाना है
हमारी जिंदगी भी एक तवायफ़ का घराना है
बहुत मजबूर होकर गीत रोटी के लिखे मैनें
तुम्हारी याद का क्या है उसे तो रोज आना है

तुम्हारे पास हूँ लेकिन जो दूरी है, समझता हूँ
तुम्हारे बिन मेरी हस्ती अधूरी है, समझता हूँ
तुम्हें मैं भूल जाऊंगा ये मुमकिन है नहीं लेकिन
तुम्ही को भूलना सबसे जरूरी है, समझता हूँ

सदा तो धूप के हाथों में ही परचम नहीं होता
खुशी के घर में भी बोलो कभी क्या गम नहीं होता
फ़कत इक आदमी के वास्ते जग छोड़ने वालों
फ़कत उस आदमी से ये ज़माना कम नहीं होता

हमारे वास्ते कोई दुआ मांगे, असर तो हो
हकीकत में कहीं पर हो न हो आँखों में घर तो हो
तुम्हारे प्यार की बातें सुनाते हैं ज़माने को
तुम्हें खबरों में रखते हैं मगर तुमको खबर तो हो

बताऊँ क्या मुझे ऐसे सहारों ने सताया है
नदी तो कुछ नहीं बोली किनारों ने सताया है
सदा ही शूल मेरी राह से खुद हट गए लेकिन
मुझे तो हर घड़ी, हर पल बहारों ने सताया है

हर इक नदिया के होठों पर समंदर का तराना है
यहाँ फरहाद के आगे सदा कोई बहाना है
वहीँ बातें पुरानी थी, वहीँ किस्सा पुराना है
तुम्हारे और मेरे बीच में फिर से ज़माना है

मेरा प्रतिमान आँसू में भिगो कर गढ़ लिया होता
अकिंचन पाँव तब आगे तुम्हारा बढ़ लिया होता
मेरी आँखों में भी अंकित समर्पण की ऋचाएं थीं
उन्हें  कुछ अर्थ मिल जाता जो तुमने पढ़ लिया होता

कोई खामोश है इतना बहाने भूल आया हूँ
किसी की इक तरन्नुम में तराने भूल आया हूँ
मेरी अब राह मत तकना कभी ऐ आसमां वालों
मैं इक चिड़िया कि आँखों में उड़ानें भूल आया हूँ

हमें दो पल सुरूरे-इश्क में मदहोश रहने दो
ज़हन की सीढियां उतरो, अंमा, ये जोश रहने दो
तुम्ही कहते थे 'ये मसले, नज़र सुलझी तो सुलझेंगें'
नज़र की बात है तो फिर ये लब खामोश रहने दो

Saturday, January 14, 2012

घड़ला सीतल नीर रा : कल्याणसिंह राजावत

कल्याणसिंह राजावत
घड़ला सीतल नीर रा, कतरा करां बखाण।
हिम सूं थारो हेत है, जळ इमरत रै पाण॥

घड़ला थारो नीर तो, कामधेन रो छीर।
मन रो पंछी जा लगै, मानसरां रै तीर॥

घड़ला थारा नीर में, गंग जमन रो सीर।
नरमद मिल गौदावरी, हर हर लेवै पीर॥

जितरी ताती लू चलै, उतरो ठंडो नीर।
तन तिरलोकी राजवी, मन व्है मलयागीर॥

बियाबान धर थार में, एक बिरछ री छांव।
मिल जावै जळ-गागरी, बो इन्नर रो गांव॥

रेत कणां झळ नीसरै, भाटै भाटै आग।
झर झर सीतल जळ झरै, घड़ला थारा भाग॥

इक गुटकी में किसन है, दो गुटकी में राम।
गटक-गटक पी लै मनां, होज्या ब्रह्म समान॥

हमारा तीर कुछ भी हो निशाने तक पहुँचता है : मुनव्वर राणा

मुनव्वर राणा
हमारा तीर कुछ भी हो निशाने तक पहुँचता है,
परिंदा कोई मौसम हो ठिकाने तक पहुँचता है,

धुँआ बादल नहीं होता कि बचपन दौड़ पड़ता है,
खुशी से कौन बच्चा कारखाने तक पहुँचता है,

हमारी मुफलिसी पर आपको हंसना मुबारक हो,
मगर ये तेज हर सय्यद घराने तक पहुँचता है,

मैं चाहूँ तो मिठाई कि दुकानें खोल सकता हूँ,
मगर बचपन हमेशा रामदाने तक पहुँचता है,

अभी ऐ जिंदगी तुमको हमारा साथ देना है,
अभी बेटा हमारा सिर्फ शाने तक पहुँचता है,

सफर का वक्त आ जाये तो फिर कोई नहीं रुकता,
मुसाफिर खुद से चल कर आबोदाने तक पहुँचता है.

Friday, January 13, 2012

सब के कहने से इरादा नहीं बदला जाता : मुनव्वर राणा

मुनव्वर राणा
सब के कहने से इरादा नहीं बदला जाता,
हर सहेली से दुपट्टा नहीं बदला जाता,

हम कि शायर हैं सियासत नहीं आती हमको,
हम से मुंह देख के लहजा नहीं बदला जाता,

हम फकीरों को फकीरी का नशा रहता है,
वरना क्या शहर में शजरा नहीं बदला जाता,

ऐसा लगता है के वो भूल गया है हमको,
अब कभी खिड़की का पर्दा नहीं बदला जाता,

जब रुलाया है तो हंसने पे ना मजबूर करो,
रोज बीमार का नुस्खा नहीं बदला जाता,

गम से फुर्सत ही कहाँ है के तुझे याद करूँ,
इतनी लाशें है तो कंधा नहीं बदला जाता,

उमर एक तल्ख़ हकीकत है दोस्तों फिर भी,
जितने तुम बदले हो उतना नहीं बदला जाता.

हर एक आवाज़ उर्दू को फरियाद बताती है : मुनव्वर राणा

मुनव्वर राणा
हर एक आवाज़ उर्दू को फ़रियाद बताती है,
ये  पगली फिर भी अब तक खुद को शहजादी बताती है,

कईं बातें मोहब्बत सबको बुनियादी बताती है,
जो  परदादी बताती थी वही दादी बताती है,

जहाँ पिछले कईं वर्षों से काले नाग रहते हैं,
वहाँ एक घोंसला चिड़ियों का था दादी बताती है,

अभी तक ये इलाका है रवादारी के कब्ज़े में,
अभी फिरकापरस्ती कम है आबादी बताती है,

यहाँ वीरानियों कि एक मुद्दत से हुकूमत है,
यहाँ से नफरतें गुज़री है बर्बादी बताती है,

लहू कैसे बहाया जाये ये लीडर बताते हैं,
लहू का जायका कैसा है ये खादी बताती है,

गुलामी ने अभी तक मुल्क का पीछा नहीं छोड़ा,
हमें फिर कैद होना है ये आज़ादी बताती है,

गरीबी क्यूँ हमारे शहर से बाहर नहीं जाती,
अमीर-ऐ-शहर के घर की हर एक शादी बताती है,

मैं  उन आँखों के महखाने में थोड़ी देर बैठा था,
मुझे दुनिया नशे का आज तक आदी बताती है.