Friday, February 17, 2012

ओ नादाँ परिंदे घर आजा - इरशाद कामिल

इरशाद कामिल
[ हिंदी फिल्म "रॉक्स्टार" (रिलीज तारीख 11-11-2011) से ]
 ओ नादाँ परिंदे घर आजा
ओ नादाँ परिंदे घर आजा
ओ नादाँ परिंदे घर आजा
घर आजा घर आजा घर आजा आ...

क्यूँ  देश-विदेश फिरे मारा
क्यूँ हाल-विहाल थका हारा
तू रात-बिरात का बंजारा
ओ नादाँ परिंदे घर आजा
घर आजा घर आजा घर आजा आ...
नादाँ परिंदे घर आजा
नादाँ परिंदे घर आजा
नादाँ परिंदे घर आजा
नादाँ परिंदे घर आजा

सौ दर्द बदन पे फैले हैं, हर करम के कपड़े मैले हैं...

काटे चाहे जितना, परों से हवाओं को
खुद से न बच पायेगा तू
तोड़ आसमानों को, फूक दे जहानों को
खुद को छुपा न पायेगा तू
कोई भी ले रस्ता, तू है तू ले हस्ता
अपने ही घर आएगा तू

ओ नादाँ...
ओ नादाँ परिंदे घर आजा
घर आजा घर आजा घर आजा आ...
नादाँ परिंदे घर आजा
नादाँ परिंदे घर आजा
नादाँ परिंदे घर आजा
नादाँ परिंदे घर आजा

डागर कागर मोरी इतनी अरज तोसे चुन चुन खाइयो मांस
डागर कागर मोरी इतनी अरज तोसे चुन चुन खाइयो मांस
रे जिया रे खाइयो ना तू नैना मोरे
पिया के मिलन की आस
खाइयो ना तू नैना मोरे खाइयो ना तू नैना मोहे
पिया के मिलन की आस

ओ नादाँ...
ओ नादाँ परिंदे घर आजा
घर आजा घर आजा घर आजा आ...
नादाँ परिंदे घर आजा
नादाँ परिंदे घर आजा
नादाँ परिंदे घर आजा
नादाँ परिंदे घर आजा
नादाँ परिंदे घर आजा
नादाँ परिंदे घर आजा
नादाँ परिंदे घर आजा
नादाँ परिंदे घर आजा...

जो भी मैं - इरशाद कामिल

इरशाद कामिल
[ हिंदी फिल्म "रॉक्स्टार" (रिलीज तारीख 11-11-2011) से ]
या या या... ओ...
जो भी मैं, कहना चाहूँ
बर्बाद करे, अलफ़ाज़ मेरे, अलफ़ाज़ मेरे
ओ या या ओ...

कभी मुझे लगे के जैसे, सारा ही ये जहाँ है जागे
जो है भी और नहीं भी है, ये फिजा हवा घटा बहारें
तुझे करे इशारे ये
कैसे कहूँ, कहानी मैं इनकी

जो भी मैं, कहना चाहूँ
बर्बाद करे, अलफ़ाज़ मेरे, अलफ़ाज़ मेरे
ओ या या ओ...

मैंने  यहीं सोचा है अक्सर, तू भी मैं भी सभी है शीशे
खुद ही को हम सभी मैं देखें, नहीं हूँ मैं हूँ मैं तो फिर भी
सही गलत, तुम्हारा मैं
मुझे पाना, पाना है खुद को

जो भी मैं, कहना चाहूँ
बर्बाद करे, अलफ़ाज़ मेरे, अलफ़ाज़ मेरे
ओ या या ओ...

Thursday, February 16, 2012

साड्डा हक, ऐथे रख - इरशाद कामिल

इरशाद कामिल
[ हिंदी फिल्म "रॉक्स्टार" (रिलीज तारीख 11-11-2011) से ]
तुम लोगों की, इस दुनिया में
हर कदम पे, इंसान ग़लत
मैं  सही समझ के जो भी कहूँ
तुम कहते हो ग़लत, मैं गलत हूँ फिर कौन सही कौन सही
मर्ज़ी से जीने की भी मैं
क्या तुम सबको मैं अर्जी दूं
मतलब कि तुम सबका मुझपे
मुझसे भी ज्यादा हक है

साड्डा हक, ऐथे रख... (8)
ना ना ना...
साड्डा हक, ऐथे रख... (4)

हे! इन गद्दारों में या उधारों में
तुम  मेरे जीने की आदत का क्यूँ घोंट रहे हो दम
बेसलीका मैं, उस गली का मैं
ना जिस में हया, ना जिस में शरम
मन बोले के रस में जीने का हरजाना दुनिया दुश्मन
सब बेगाना इन्हें आग लगाना
मन बोले मन बोले, मन से जीना या मर जाना

साड्डा हक, ऐथे रख... (8)
ना ना ना...

ओ  इको-फ्रेंडली, नेचर के रक्षक, मैं भी हूँ नेचर
रिवाजों से, समाजों से क्यूँ
तू काटे मुझे, क्यूँ बांटे मुझे इस तरह
क्यूँ सच का सबक सिखाए, जब सच सुन भी न पाए
सच कोई बोले तो तू, नियम क़ानून बताए
तेरा डर, तेरा प्यार, तेरी वाह, तू ही रख रख साला

साड्डा हक, ऐथे रख... (4)
ऐथे ऐथे रख
साड्डा हक, ऐथे रख... (8)

तुम हो - इरशाद कामिल

इरशाद कामिल
[ हिंदी फिल्म "रॉक्स्टार" (रिलीज तारीख 11-11-2011) से ]
तुम हो...

तुम हो आस मेरे, साथ मेरे
हो तुम हो
जितना महसूस करूँ तुमको उतना ही पा भी लूं.


तुम हो मेरे लिए मेरे लिए हो तुम यूं
खुद को मैं हार गया तुमको
तुमको मैं जीता हूँ

कहीं से कहीं को भी

आओगे मज़ा चले

पूछे बिना किसीसे हम मिले
बंदिशें ना रही

तुम हो...

तुम हो आस मेरे, साथ मेरे
हो तुम हो
जितना महसूस करूँ तुमको उतना ही पा भी लूं.


किस तरह छीनेगा
मुझसे ये जहाँ तुम्हें
तुम भी हो फिर क्या फिकर अब हमें
तुम हो मेरे लिए मेरे लिए हो तुम यूं
खुद को मैं हार गया तुमको
तुमको मैं जीता हूँ

तुम हो...

Monday, February 13, 2012

कुछ शे'र - जावेद अख़्तर

जावेद अख़्तर
गिन गिन के सिक्के हाथ मेरा खुरदरा हुआ
जाती रही वो लम्स[1] की नर्मी, बुरा हुआ
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ऊँची इमारतों से मकां मेरा घिर गया
कुछ लोग मेरे हिस्से का सूरज भी खा गए
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कौन-सा शे'र सुनाऊँ मैं तुम्हें, सोचता हूँ
नया मुब्हम[2] है बहुत और पुराना मुश्किल
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ख़ुशशकल[3] भी है वो, ये अलग बात है, मगर
हमको ज़हीन[4] लोग हमेशा अज़ीज़[5] थे
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हमको उठना तो मुँह अँधेरे था
लेकिन इक ख़्वाब हमको घेरे था
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सब का ख़ुशी से फ़ासला एक क़दम है
हर घर में बस एक ही कमरा कम है
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अपनी वजहे-बरबादी सुनिये तो मज़े की है
ज़िंदगी से यूँ खेले जैसे दूसरे की है
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इस शहर में जीने के अंदाज़ निराले हैं
होठों पे लतीफ़े हैं आवाज़ में छाले हैं
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गली में शोर था मातम था और होता क्या
मैं घर में था मगर इस गुल[6] में कोई सोता क्या
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आज की दुनिया में जीने का क़रीना[7] समझो
जो मिलें प्यार से उन लोगों को ज़ीना[8] समझो
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कम से कम उसको देख लेते थे
अब के सैलाब में वो पुल भी गया
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ऐ सफ़र इतना रायगाँ[9] तो न जा
न हो मंज़िल कहीं तो पहुँचा दे
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लो देख लो यह इश्क़ है ये वस्ल[10] है ये हिज़्र[11]
अब लौट चलें आओ बहुत काम पड़ा है
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वह शक्ल पिघली तो हर शय में ढल गयी जैसे
अजीब बात हुई है उसे भुलाने में
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वो नहर एक क़िस्सा है दुनिया के वास्ते
फ़रहाद ने तराशा था ख़ुद को चटान पर
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मिरे वुजूद से यूँ बेख़बर है वो जैसे
वो एक धूपघड़ी है मैं रात का पल हूँ
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उन चराग़ों में तेल ही कम था
क्यों गिला फिर हमें हवा से रहे
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मेरी बुनियादों में कोई टेढ़ थी
अपनी दीवारों को क्या इल्ज़ाम दूँ
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तुम्हें भी याद नहीं और मैं भी भूल गया
वो लम्हा कितना हसीं था मगर फ़ुज़ूल गया
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आगही[12] से मिली है तनहाई
आ मिरी जान मुझको धोखा दे
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रात सर पर है और सफ़र बाकी
हमको चलना ज़रा सवेरे था
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सब हवाएँ ले गया मेरे समंदर की कोई
और मुझको एक कश्ती बादबानी[13] दे गया
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पहले भी कुछ लोगों ने जौ बो कर गेहूँ चाहा था
हम भी इस उम्मीद में हैं लेकिन कब ऐसा होता है
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मेरे कुछ पल मुझको दे दो बाकी सारे दिन लोगो
तुम जैसा जैसा कहते हो सब वैसा वैसा होगा
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अब अगर आओ तो जाने के लिए मत आना - ज़ावेद अख्तर

ज़ावेद अख्तर
अब अगर आओ तो जाने के लिए मत आना
सिर्फ एहसान जताने के लिए मत आना

मैंने पलकों पे तमन्‍नाएँ सजा रखी हैं
दिल में उम्‍मीद की सौ शम्‍मे जला रखी हैं
ये हसीं शम्‍मे बुझाने के लिए मत आना

प्‍यार की आग में जंजीरें पिघल सकती हैं
चाहने वालों की तक़दीरें बदल सकती हैं
तुम हो बेबस ये बताने के लिए मत आना

अब तुम आना जो तुम्‍हें मुझसे मुहब्‍बत है कोई
मुझसे मिलने की अगर तुमको भी चाहत है कोई
तुम कोई रस्‍म निभाने के लिए मत आना

कभी यूँ भी तो हो - ज़ावेद अख्तर

ज़ावेद अख्तर
कभी यूँ भी तो हो
दरिया का साहिल हो
पूरे चाँद की रात हो
और तुम आओ


कभी यूँ भी तो हो
परियों की महफ़िल हो
कोई तुम्हारी बात हो
और तुम आओ


कभी यूँ भी तो हो
ये नर्म मुलायम ठंडी हवायें
जब घर से तुम्हारे गुज़रें
तुम्हारी ख़ुश्बू चुरायें
मेरे घर ले आयें


कभी यूँ भी तो हो
सूनी हर मंज़िल हो
कोई न मेरे साथ हो
और तुम आओ


कभी यूँ भी तो हो
ये बादल ऐसा टूट के बरसे
मेरे दिल की तरह मिलने को
तुम्हारा दिल भी तरसे
तुम निकलो घर से


कभी यूँ भी तो हो
तनहाई हो, दिल हो
बूँदें हो, बरसात हो
और तुम आओ


कभी यूँ भी तो हो

हर ख़ुशी में कोई कमी-सी है - ज़ावेद अख्तर

ज़ावेद अख्तर
हर ख़ुशी में कोई कमी-सी है
हँसती आँखों में भी नमी-सी है

दिन भी चुप चाप सर झुकाये था
रात की नब्ज़ भी थमी-सी है

किसको समझायें किसकी बात नहीं
ज़हन और दिल में फिर ठनी-सी है

ख़्वाब था या ग़ुबार था कोई
गर्द इन पलकों पे जमी-सी है

कह गए हम ये किससे दिल की बात
शहर में एक सनसनी-सी है

हसरतें राख हो गईं लेकिन
आग अब भी कहीं दबी-सी है

यही हालात इब्तदा से रहे - ज़ावेद अख्तर

ज़ावेद अख्तर
यही हालात इब्तदा[1] से रहे
लोग हमसे ख़फ़ा-ख़फ़ा-से रहे

बेवफ़ा तुम कभी न थे लेकिन
ये भी सच है कि बेवफ़ा-से रहे

इन चिराग़ों में तेल ही कम था
क्यों गिला फिर हमें हवा से रहे

बहस, शतरंज, शेर, मौसीक़ी[2]
तुम नहीं रहे तो ये दिलासे रहे

उसके बंदों को देखकर कहिये
हमको उम्मीद क्या ख़ुदा से रहे

ज़िन्दगी की शराब माँगते हो
हमको देखो कि पी के प्यासे रहे

मैं तो झोंका हूँ हवा का उड़ा ले जाऊँगा - डॉ. कुमार विश्वास

डॉ. कुमार विश्वास
मैं तो झोंका हूँ हवा का उड़ा ले जाऊँगा
जागती रहना तुझे तुझसे चुरा ले जाऊँगा

हो के कदमों पे निछावर फूल ने बुत से कहा
ख़ाक में मिल के भी मैं खुश्बू बचा ले जाऊँगा

कौन सी शै मुझको पहुँचाएगी तेरे शहर तक
ये पता तो तब चलेगा जब पता ले जाऊँगा

कोशिशें मुझको मिटाने की भले हों कामयाब
मिटते-मिटते भी मैं मिटने का मजा ले जाऊँगा

शोहरतें जिनकी वजह से दोस्त दुश्मन हो गये
सब यह रह जायेंगी मैं साथ क्या ले जाऊँगा