Monday, January 16, 2012

कोई दीवाना कहता है : डॉ. कुमार विश्वास

डॉ. कुमार विश्वास
कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है
मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है
मैं तुझसे दूर कैसा हूँ तू मुझसे दूर कैसी है
ये तेरा दिल समझता है या मेरा दिल समझता है

मुहब्बत एक अहसासों की पावन सी कहानी है
कभी कबीरा दीवाना था कभी मीरा दीवानी है
यहाँ सब लोग कहते हैं मेरी आँखों में आंसू है
जो तू समझे तो मोती है जो ना समझे तो पानी है

बदलने को तो इन आँखों के मंज़र कम नहीं बदले
तुम्हारी याद के मौसम हमारे ग़म नहीं बदले
तुम अगले जन्म में हमसे मिलोगी तब तो मानोगी
ज़माने और सदी की इस बदल में हम नहीं बदले

हमें मालूम है दो दिल जुदाई सह नहीं सकते
मगर रस्मे-वफ़ा ये है, कि ये भी कह नहीं सकते
ज़रा कुछ देर तुम उन साहिलों कि चीख सुन भर लो
जो लहरों में तो डूबे हैं, मगर संग बह नहीं सकते

समंदर पीर का अंदर है लेकिन रो नहीं सकता
ये आंसू प्यार का मोती है इसको खो नहीं सकता
मेरी चाहत को दुल्हन तू बना लेना मगर सुन ले
जो मेरा हो नहीं पाया वो तेरा हो नहीं सकता

कि भ्रमर कोई कुमुदनी पर मचल बैठा तो हंगामा
हमारे दिल में कोई ख्वाब पल बैठा तो हंगामा
अभी तक डूब कर सुनते थे सब किस्सा मुहब्बत का
मैं किस्से को हकीकत में बदल बैठा तो हंगामा

मिले हर जख्म को मुस्कान से सीना नहीं आया
अमरता चाहते थे, पर गरल पीना नहीं आया
तुम्हारी और मेरी दास्ताँ में फ़र्क इतना है
मुझे मरना नहीं आया, तुम्हे जीना नहीं आया

पनाहों में जो आया हो तो उस पे वार क्या करना
जो दिल हार हुआ हो उस पे फिर अधिकार क्या करना
मुहब्बत का मज़ा तो डूबने कि कश्मकश में है
हो ग़र मालूम गहराई तो दरिया पार क्या करना

जहाँ हर दिन सिसकना है जहाँ हर रात गाना है
हमारी जिंदगी भी एक तवायफ़ का घराना है
बहुत मजबूर होकर गीत रोटी के लिखे मैनें
तुम्हारी याद का क्या है उसे तो रोज आना है

तुम्हारे पास हूँ लेकिन जो दूरी है, समझता हूँ
तुम्हारे बिन मेरी हस्ती अधूरी है, समझता हूँ
तुम्हें मैं भूल जाऊंगा ये मुमकिन है नहीं लेकिन
तुम्ही को भूलना सबसे जरूरी है, समझता हूँ

सदा तो धूप के हाथों में ही परचम नहीं होता
खुशी के घर में भी बोलो कभी क्या गम नहीं होता
फ़कत इक आदमी के वास्ते जग छोड़ने वालों
फ़कत उस आदमी से ये ज़माना कम नहीं होता

हमारे वास्ते कोई दुआ मांगे, असर तो हो
हकीकत में कहीं पर हो न हो आँखों में घर तो हो
तुम्हारे प्यार की बातें सुनाते हैं ज़माने को
तुम्हें खबरों में रखते हैं मगर तुमको खबर तो हो

बताऊँ क्या मुझे ऐसे सहारों ने सताया है
नदी तो कुछ नहीं बोली किनारों ने सताया है
सदा ही शूल मेरी राह से खुद हट गए लेकिन
मुझे तो हर घड़ी, हर पल बहारों ने सताया है

हर इक नदिया के होठों पर समंदर का तराना है
यहाँ फरहाद के आगे सदा कोई बहाना है
वहीँ बातें पुरानी थी, वहीँ किस्सा पुराना है
तुम्हारे और मेरे बीच में फिर से ज़माना है

मेरा प्रतिमान आँसू में भिगो कर गढ़ लिया होता
अकिंचन पाँव तब आगे तुम्हारा बढ़ लिया होता
मेरी आँखों में भी अंकित समर्पण की ऋचाएं थीं
उन्हें  कुछ अर्थ मिल जाता जो तुमने पढ़ लिया होता

कोई खामोश है इतना बहाने भूल आया हूँ
किसी की इक तरन्नुम में तराने भूल आया हूँ
मेरी अब राह मत तकना कभी ऐ आसमां वालों
मैं इक चिड़िया कि आँखों में उड़ानें भूल आया हूँ

हमें दो पल सुरूरे-इश्क में मदहोश रहने दो
ज़हन की सीढियां उतरो, अंमा, ये जोश रहने दो
तुम्ही कहते थे 'ये मसले, नज़र सुलझी तो सुलझेंगें'
नज़र की बात है तो फिर ये लब खामोश रहने दो

Saturday, January 14, 2012

घड़ला सीतल नीर रा : कल्याणसिंह राजावत

कल्याणसिंह राजावत
घड़ला सीतल नीर रा, कतरा करां बखाण।
हिम सूं थारो हेत है, जळ इमरत रै पाण॥

घड़ला थारो नीर तो, कामधेन रो छीर।
मन रो पंछी जा लगै, मानसरां रै तीर॥

घड़ला थारा नीर में, गंग जमन रो सीर।
नरमद मिल गौदावरी, हर हर लेवै पीर॥

जितरी ताती लू चलै, उतरो ठंडो नीर।
तन तिरलोकी राजवी, मन व्है मलयागीर॥

बियाबान धर थार में, एक बिरछ री छांव।
मिल जावै जळ-गागरी, बो इन्नर रो गांव॥

रेत कणां झळ नीसरै, भाटै भाटै आग।
झर झर सीतल जळ झरै, घड़ला थारा भाग॥

इक गुटकी में किसन है, दो गुटकी में राम।
गटक-गटक पी लै मनां, होज्या ब्रह्म समान॥

हमारा तीर कुछ भी हो निशाने तक पहुँचता है : मुनव्वर राणा

मुनव्वर राणा
हमारा तीर कुछ भी हो निशाने तक पहुँचता है,
परिंदा कोई मौसम हो ठिकाने तक पहुँचता है,

धुँआ बादल नहीं होता कि बचपन दौड़ पड़ता है,
खुशी से कौन बच्चा कारखाने तक पहुँचता है,

हमारी मुफलिसी पर आपको हंसना मुबारक हो,
मगर ये तेज हर सय्यद घराने तक पहुँचता है,

मैं चाहूँ तो मिठाई कि दुकानें खोल सकता हूँ,
मगर बचपन हमेशा रामदाने तक पहुँचता है,

अभी ऐ जिंदगी तुमको हमारा साथ देना है,
अभी बेटा हमारा सिर्फ शाने तक पहुँचता है,

सफर का वक्त आ जाये तो फिर कोई नहीं रुकता,
मुसाफिर खुद से चल कर आबोदाने तक पहुँचता है.

Friday, January 13, 2012

सब के कहने से इरादा नहीं बदला जाता : मुनव्वर राणा

मुनव्वर राणा
सब के कहने से इरादा नहीं बदला जाता,
हर सहेली से दुपट्टा नहीं बदला जाता,

हम कि शायर हैं सियासत नहीं आती हमको,
हम से मुंह देख के लहजा नहीं बदला जाता,

हम फकीरों को फकीरी का नशा रहता है,
वरना क्या शहर में शजरा नहीं बदला जाता,

ऐसा लगता है के वो भूल गया है हमको,
अब कभी खिड़की का पर्दा नहीं बदला जाता,

जब रुलाया है तो हंसने पे ना मजबूर करो,
रोज बीमार का नुस्खा नहीं बदला जाता,

गम से फुर्सत ही कहाँ है के तुझे याद करूँ,
इतनी लाशें है तो कंधा नहीं बदला जाता,

उमर एक तल्ख़ हकीकत है दोस्तों फिर भी,
जितने तुम बदले हो उतना नहीं बदला जाता.

हर एक आवाज़ उर्दू को फरियाद बताती है : मुनव्वर राणा

मुनव्वर राणा
हर एक आवाज़ उर्दू को फ़रियाद बताती है,
ये  पगली फिर भी अब तक खुद को शहजादी बताती है,

कईं बातें मोहब्बत सबको बुनियादी बताती है,
जो  परदादी बताती थी वही दादी बताती है,

जहाँ पिछले कईं वर्षों से काले नाग रहते हैं,
वहाँ एक घोंसला चिड़ियों का था दादी बताती है,

अभी तक ये इलाका है रवादारी के कब्ज़े में,
अभी फिरकापरस्ती कम है आबादी बताती है,

यहाँ वीरानियों कि एक मुद्दत से हुकूमत है,
यहाँ से नफरतें गुज़री है बर्बादी बताती है,

लहू कैसे बहाया जाये ये लीडर बताते हैं,
लहू का जायका कैसा है ये खादी बताती है,

गुलामी ने अभी तक मुल्क का पीछा नहीं छोड़ा,
हमें फिर कैद होना है ये आज़ादी बताती है,

गरीबी क्यूँ हमारे शहर से बाहर नहीं जाती,
अमीर-ऐ-शहर के घर की हर एक शादी बताती है,

मैं  उन आँखों के महखाने में थोड़ी देर बैठा था,
मुझे दुनिया नशे का आज तक आदी बताती है.