Saturday, January 14, 2012

हमारा तीर कुछ भी हो निशाने तक पहुँचता है : मुनव्वर राणा

मुनव्वर राणा
हमारा तीर कुछ भी हो निशाने तक पहुँचता है,
परिंदा कोई मौसम हो ठिकाने तक पहुँचता है,

धुँआ बादल नहीं होता कि बचपन दौड़ पड़ता है,
खुशी से कौन बच्चा कारखाने तक पहुँचता है,

हमारी मुफलिसी पर आपको हंसना मुबारक हो,
मगर ये तेज हर सय्यद घराने तक पहुँचता है,

मैं चाहूँ तो मिठाई कि दुकानें खोल सकता हूँ,
मगर बचपन हमेशा रामदाने तक पहुँचता है,

अभी ऐ जिंदगी तुमको हमारा साथ देना है,
अभी बेटा हमारा सिर्फ शाने तक पहुँचता है,

सफर का वक्त आ जाये तो फिर कोई नहीं रुकता,
मुसाफिर खुद से चल कर आबोदाने तक पहुँचता है.

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