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| मुनव्वर राणा |
हर सहेली से दुपट्टा नहीं बदला जाता,
हम कि शायर हैं सियासत नहीं आती हमको,
हम से मुंह देख के लहजा नहीं बदला जाता,
हम फकीरों को फकीरी का नशा रहता है,
वरना क्या शहर में शजरा नहीं बदला जाता,
ऐसा लगता है के वो भूल गया है हमको,
अब कभी खिड़की का पर्दा नहीं बदला जाता,
जब रुलाया है तो हंसने पे ना मजबूर करो,
रोज बीमार का नुस्खा नहीं बदला जाता,
गम से फुर्सत ही कहाँ है के तुझे याद करूँ,
इतनी लाशें है तो कंधा नहीं बदला जाता,
उमर एक तल्ख़ हकीकत है दोस्तों फिर भी,
जितने तुम बदले हो उतना नहीं बदला जाता.

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